असमंजस की स्थिति में कभी-कभी सूझता ही नहीं कि क्या करें। हर इंसान ने ऐसी परिस्थितियां देखी हैं जब दिल का कहा मानना उचित होता है किंतु दिमाग गवाही नहीं देता है। कलमकार इरफान आब्दी मांटवी गाजीपुरी अपनी कविता में इस दशा को बयान करते हैं।
दिल के तुम्हारे दिल से सवालात क्या करें
आंखों में पढ़ चुका हूं जवाबात, क्या करेंए ज़िन्दगी समेट लो अपने वूजूद को
तन्हाइयों से डर गई हयात, क्या करेंमै खुद से पूछता हूं खुद ही के सवाल को
उस से अगर ना हुई मुलाक़ात, क्या करेंमैं ने शजर लगाए थे साए के वास्ते
साए में वो ना आए तो बाग़ात, क्या करेंअब मेरी खामोशी को कहो अपनी नक़ल मत
मिलने लगे हैं तुम से खयालात, क्या करेंजिनकी यक़ीं नहीं है कि खालिक़ है तू खुदा
वो लोग तेरी राह में खैरात, क्या करेंइरफ़ान बारिशों में छुपाने लगा है अश्क
अशआर में उतर गए जज़्बात, क्या करें~ इरफान आब्दी मांटवी गाजीपुरी
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