चाह बिटिया की

हर इंसान की अपनी इच्छाएं होती हैं, हमारी बेटियों के मन में भी अनेक इच्छाएं और अरमान होते हैं। हमें उनकी चाहतों को जान समझकर अवश्य पूरा करना चाहिए। कलमकार गौरव शुक्ला ‘अतुल’ अपनी कविता में बेटियों की चाह को बताने का प्रयास किया है।

मैं आज़ाद पँछी सी एक दिन यूँ ही उड़ जाऊँगी..
बस यही कुछ पल और यादें छोड़ जाऊंगी..
जब तक हूँ सता लूँ मैं आपको पापा..
वरना चाह कर भी न सता पाऊंगी..
बचपन से आपने मुझे सीने से लगाया..
एक फलित वृक्ष और दिल हीरे सा बनाया..
मैं दे सकूँ छांव एक कुटुम्ब को, किया जो बन आया..
मैं भी एक कुटुम्ब का अब हिस्सा बन जाऊंगी..
हक़ीक़त से शायद अब बस यादों में बस जाऊंगी..
जब तक हूँ सता लूँ मैं आपको पापा..
वरना चाह कर भी न सता पाऊंगी..
जिसने बिखरे सपने को समेटना सिखाया..
वक़्त को देखकर, ख़ुद को देखना सिखाया..
जीवन की शुरुआत आपसे,
मैं आपको यूँ उदास न देख पाऊंगी..
मैं शायद अब बड़ी हो गयी..
फिर आँगन में न खेल पाऊंगी..
जब तक हूँ सता लूँ मैं आपको पापा..
वरना चाह कर भी न सता पाऊंगी..
खुशियों का दामन मैं छीन लाऊंगी,
बस देखकर आपको मैं ख़ुश हो जाऊंगी,
सामने रहो, ओझल आंखों से न देख पाऊंगी..
ख़ुशी और गम के फासले नही पता मुझे,
बस मैं फिर बचपन में लौट आऊंगी..

~ गौरव शुक्ला ‘अतुल’


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