किसी को तकलीफ़ से उबार लेना बहुत ही उत्तम व्यवहार है। कलमकार विजय कनौजिया लिखते हैं कि तुम्हे कभी भी रोने का अवसर नहीं मिलेगा क्योंकि मीत बनकर मैं तुम्हें मना लूँगा।
जब रूठ कभी तुम जाओगे
तो बनकर मीत मनाऊंगा
जब नींद तुम्हें न आएगी
मैं लोरी तुम्हें सुनाऊंगा..।।जब दुखी तुम्हारा मन होगा
तब आकर मैं बहलाऊँगा
जब मुस्कानें होंगी फीकी
बनकर मुस्कान हसाउंगा..।।मैं साथ कभी न छोड़ूंगा
तुम साथी बनकर देखो तो
लेकर हाथों में हाथ तेरा
जीवन भर साथ निभाउंगा..।।मेरी चाहत के उपवन में
तुम प्रेम वृक्ष रोपण कर दो
होगा पुष्पित फिर प्रेम पुष्प
सारा जीवन महकाउंगा..।।प्रस्ताव मेरा स्वीकार करो
आभारी मैं हो जाऊंगा
मैं खुद चाहे जितना रोऊं
पर तुमको नहीं रुलाऊंगा..।।
पर तुमको नहीं रुलाऊंगा..।।~ विजय कनौजिया
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