बदला जमाना है

सुना है कि जमाना बदल गया है किंतु कलमकार शुभम सिंह ने ऐसा नहीं माना और इस कथन को अपनी कविता के जरिए गलत सिद्ध करने का प्रयास किया है। परिवर्तन तो संसार का नियम है और उसी का अनुपालन करते हुए हम सभी बहुत ज्यादा बदल गए हैं।

है वही बसंत वही पवन,
मौसम सुहाना है,
आज भी बागों में कोयल
का गाना है।

कुछ नहीं बदला, बदले हैं हम
और हरदम कहते है,
बदला जमाना है।

शायद हम कंजूस हुए है।
प्रेम को भी तौलते है।
महंगाई बढ़ी है इसलिए
मीठा कम बोलते है।

आज भी निश्चित है,
सूर्य का उगना पूरब मे,
और पश्चिम में
डूब जाना है।

कुछ नहीं बदला, बदले हैं हम
और हरदम कहते है
बदला जमाना है।

‘व्यस्तता’ तो सिर्फ बहाना है,
हमने धारणा बना ली हैं कि
दुनिया जाये भाड़ में,
खुद ढ़ोल नगारा बजाना है।

कुछ नहीं बदला, बदले हैं हम
और हरदम कहते है
बदला जमाना है।

शायद हम भूल चुके है कि
मानव दया की मूरत है
हर सामनेवाला ईश्वर की सूरत है।
बदला कुछ नही,
हमे अपनी सोच बदलने की जरूरत है।

~शुभम सिंह


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