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  • इमरान सम्भलशाही की कहानियाँ

    १. माँ का थैला हर बार की तरह माँ चूल्हे के पास बैठकर आटा गूँथने में लग गई थी, मन ही मन कुछ बुदबुदाए जा रही थी और हाथ के कोहनी से बार बार आटा गूँथने के दौरान माथे पर झलक रही पसीने की बूंदे पोछे जा रही थी। पचपन बरस की अपनी इस उम्र…