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  • पृथ्वी के घाव भर रहे हैं

    पृथ्वी के घाव भर रहे हैं

    पृथ्वी के घाव भर रहे हैंजी हाँसही सुना, आपनेपृथ्वी के घाव भर रहे हैंहाँ, वही घावजो उसे मनुष्य ने दिए थेअपनी अनगिनत महत्वाकांक्षाओं की तृप्ति के लिएअपनी अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिएअपने निर्मम स्वार्थ की सिद्धि के लिएअपनी बेशर्म लिप्साओं के वशीभूत होकरआज जब मानव घरों में कैद हैदर्द से कराह रहा हैऔर उसके…