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  • मैं रिझाऊंगा फिर

    मैं रिझाऊंगा फिर

    कलमकार विजय कनौजिया अपनी इस कविता में हँसने, मनाने, रिझाने कि बात लिख रहें हैं। कभी कभी हम उदास होते हैं तो ऐसा लगता है कि यह आलम समाप्त ही न होगा पर ऐसा नहीं होता है और कुछ पल के बाद हम फिर से मुस्कुरा उठते हैं। कितनी हसरत लिएमैं भटकता रहाकोई मिल जाएगाकोई भा…