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पिंजरे में बंद मानव
क्यों अच्छा लग रहा है न? अब पंछियों की तरह कैद होकर तुम ही तो कहते थे न, सब कुछ तो दे रहे हैं हम दाना-पानी इतना अच्छा पिंजरा तो अब क्यों ? खुद ही तड़प रहे हो उसी पिंजरे में बैठकर। क्यों बंधे हुए हाथ-पांव अच्छे नहीं लग रहें तुम्हें? मगर तुमने भी तो…