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कुछ दरकी सी जिंदगी
स्त्रियों के जीवन पर कलमकार सुप्रीता वात्स्यायन लिखतीं हैं कि वह दो भागों में बट सी गई है। मायके और ससुराल के बीच जिंदगी भी कुछ दरक गई है; आइये यह कविता पढें। ऐसे क्यूँ है नारीजीवन दो भागों में दरकी सी बाबा मुझको बतला दो क्या यही नियति है लङकी की आधा जीवन घर…