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नज़राना (कुंडलियाँ छंद)
कैसा नजराना मिला, सकल विश्व को आज।चलते चलते थम गये, आवश्यक सब काज।।आवश्यक सब काज, बला ये कैसी आयी।काली मेघ समान, घटा बनकर जो छायी।सबके समक्ष उदास, ठाड़ा असहाय पैसा।व्यथित मनुज समाज, मिला नजराना कैसा।।१॥ नजराने की सोचकर, दिल हो जाता बाग।बजने लगते हर तरफ, तरह तरह के राग।।तरह तरह के राग, पुण्य की बछिया…