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मजदूर की आवाज
चारों ओर से सवालों का बौछार था,अपने ही व्यवस्था से बीमार था,लेकिन रेल की पटरी से उठ खड़ा जवाब तैयार था,मैं मजदूर था साहब!अपने ही घर की छतों से दूर था,बस रोटी के लिए मजबूर था। परिस्थितियों का मारा था,पर स्थितियों से नहीं हारा था,सबको चुनौती देकर घर से निकल पड़ा बंजारा था। बस अपनों…