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प्रवासी मजदूर
देख पीड़ा श्रमिक की मन रहा है डर स्याह हर उम्मीद है जाए तो किस दर रेल की पटरी हो या हो कोई सड़क हो रक्त रंजित चीखती है सभी डगर धैर्य की भी सीमा, होती है संसार में पार उसके पार करलूँ कैसे ये सफर पीड़ा उनकी आज साहिब जरा सुनो चिलचिलाती धूप है…