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  • आ अब लौट चलें

    आ अब लौट चलें

    कलमकार कुलदीप दहिया की एक कविता पढिए जिसमें उन्होने इंसानी फितरत और मौजूदा हालातों को चित्रित किया है। हैं चारों ओर वीरानियाँ खामोशियाँ, तन्हाईयाँ, परेशानियाँ, रुसवाईयाँ सब ओर ग़ुबार है! आ अब लौट चलें चीत्कार, हाहाकार है मृत्यु का तांडव यहाँ, है आदमी के भेष में यहां भेड़िये हजार हैं! आ अब लौट चलें खून…